
उन्हें उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी नगर पंचायत ओबरा की पहली महिला सभासद होने का गौरव प्राप्त है.मलिन बस्ती की इस सभासद से नागरिको को बड़ी उम्मीद थी.यह दलित महिला मलिन बस्ती के लोगो के लिए लगातार दौडती रहती थी.उसके प्रयासों से पहली बार मलिन बस्ती में नाली का निर्माण हुआ.इस बस्ती के ५०० से ज्यादा लोगो का मतदाता सूची में नाम जुड़ा.सबसे बड़ी उपलब्धि सामाजिक सम्मान में वृद्धि को माना गया.लेकिन दिन भर दुसरो के लिए चहलकदमी करने वाली महिला की चाल आज थम गयी है.एक पुरे समाज की प्रतीक बन गयी यह महिला आज दर्द के कोने में सिमट गयी है.कभी जिनके दरवाजे पर पीडितो की भीड़ लगी रहती थी आज वह स्वयं पीड़ित शब्द की सबसे बड़ी परिभाषा है. हम बात कर रहे है एशिया की सबसे बड़ी विद्युत नगरी ओबरा की पूर्व सभासद धन्जा देवी की.जिनके बाएं पैर में हुए अप्रत्यासित फाइलेरिया ने उन्हें लाचारगी के उस हद पर पंहुचा दिया है जहाँ से वे अपने टूटते सपनो और तन्हाई के शिवा कुछ नहीं पाती है.उनके फाइलेरिया का आकार इतना बढ़ गया कि वे अपने दैनिक कार्य भी बड़ी मुश्किलों से कर पाती है.पिछले एक दशक में ही उनका जीवन सेवक से सेवा लायक हो गया.उनके मामले में राजनीति का कड़वा सच देखने को मिला.जिस बी.जे पी ने उन्हें टिकट देकर सभासद बनवाया था.उनके इलाज में कभी कोई सहयोग नहीं किया.अत्यंत गरीब विधवा महिला के पास इतना पैसा कभी नहीं रहा कि वे अच्छा इलाज करवा पाए.पचास से साठ हजार के खर्च के कारण उचित इलाज नहीं करवा पाने के कारण आज वे उस मलिन बस्ती के लिए बेकार हैं.जिसके लिए उन्होंने दिन रात एक किया हुआ था. बहरहाल उनकी बातों से आज भी मलिन बस्ती के लिए पीडा झलकती है.वे कहती हैं कि उन्हें पीडा है कि वे अब बस्ती के लिए काम नहीं आ पा रही है.पता नहीं भगवान ने मुझे ऐसा रोग क्यों दिया कि में अपना मनपसंद कार्य नहीं कर पाती. चलना मुझे सबसे अच्छा लगता था.

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