सोमवार, 16 मार्च 2009
दर्द इतना की दर्द शब्द के मायने ही बदल जाये
उनके गले से टपकता पानी जैसे उन्हें भान करा रहा है की उनके जीवन का घडा जल्द ही सुख जायेगा.कुछ दिनों में वे इतिहास का हिस्सा हो जाएँगी,पीछे छोड़ जाएँगी एक लम्बी पारम्परिक उपेक्षा की दास्ताँ. ऐसी दास्ताँ जिसमे दर्द के अलावा कुछ भी नहीं.किसी माँ के लिए इससे बड़ा दर्द क्या होगा की उसके बच्चे उसे देखना पसंद न करें,एक काल कोठरी में बैठी वह अपने बच्चो की आवाज सुनने को बेचैन रहती है.लेकिन उनका समय अब तेजी से पूरा होते जा रहा है.उनके गले से तेजी से रिसाव हो रहा है,गावं वाले मान रहे है की वे अब कुछ दिनों की मेहमान हैं.हम बात कर रहे है सोनभद्र जिले के दुर्गम कहे जाने वाले नवा टोला की आदिवासी महिला दशोत्तरी देवी की.आठ वर्ष पहले उनके गले में हुए ट्यूमर ने अब अप्रत्यासित रूप धारण कर लिया है.जब वह छोटा था तभी उन्होंने इलाज शुरू किया था,लेकिन सरकारी चिकित्सको की निरंकुशता तथा जबरदस्त गरीबी ने उन्हें इलाज बंद करने पर मजबूर कर दिया.आज वे अपने रोग की वजह से पहचानी जाती हैं.भयंकर दर्द में जीने वाली इस आदिवासी महिला के पति राम अधार मायूस होते हुए कहते हैं की सैकडो चक्कर उन्होंने सामुदायिक स्वाश्थ्य केंद्र के लगाये लेकिन चिकित्सको के रवैये से यह लगता था की वे भी उसे देखना पसंद नहीं करते थे.एक बार चिकित्सको के पास ले जाने पर जो भी खर्च होता था उसके कारन दो दिनों तक घर में चूल्हा नहीं जल पता था.इस वजह से बच्चे भूखे रह जाते थे,जिसके वजह से इलाज बंद करना पड़ा.भावुक राम अधार कहते है की "उ दस्शो के नहीं बचा पईलें.कभो अतना पैसा नहीं रहल की ओके बनारस ले जा पायें.रोते हुए वे कहते है की " चला ठीक है इ जीना से मर जाना ठीक रही. खैर दशोत्तरी देवी तो अब कुछ दिनों की मेहमान है.लेकिन उनके प्रति बरती गई उपेक्षा ने यह साबित कर दिया है की आदिवासियों के मामले में यह देश कितना गंभीर है.
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