ऐसा समय जहाँ तम्बाकू का भय स्पष्ट रूप से दिख रहा था.यह शायद ऐड्स के बाद सबसे बड़ा खतरा दिख रहा था.लेकिन मुंबई में ८ मार्च से १२ मार्च तक आयोजित चौदहवीं वर्ल्ड टोबैको OR हैल्थ कांफ्रेंस में यह स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ा की अगर हम इस भयंकर खतरे से नहीं चेते तो लाखो लोग इसकी भेट चढ़ जायेंगे.दुनिया के १३१ देशो से आये प्रतिनिधियों ने यह माना की इस वैश्विक खतरे से निपटने में अगर देरी हुई तो यमराज से भेट हर सेकंड पर होगी.
सोमवार, 16 मार्च 2009
टूटती उम्मीदें

उन्हें उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी नगर पंचायत ओबरा की पहली महिला सभासद होने का गौरव प्राप्त है.मलिन बस्ती की इस सभासद से नागरिको को बड़ी उम्मीद थी.यह दलित महिला मलिन बस्ती के लोगो के लिए लगातार दौडती रहती थी.उसके प्रयासों से पहली बार मलिन बस्ती में नाली का निर्माण हुआ.इस बस्ती के ५०० से ज्यादा लोगो का मतदाता सूची में नाम जुड़ा.सबसे बड़ी उपलब्धि सामाजिक सम्मान में वृद्धि को माना गया.लेकिन दिन भर दुसरो के लिए चहलकदमी करने वाली महिला की चाल आज थम गयी है.एक पुरे समाज की प्रतीक बन गयी यह महिला आज दर्द के कोने में सिमट गयी है.कभी जिनके दरवाजे पर पीडितो की भीड़ लगी रहती थी आज वह स्वयं पीड़ित शब्द की सबसे बड़ी परिभाषा है. हम बात कर रहे है एशिया की सबसे बड़ी विद्युत नगरी ओबरा की पूर्व सभासद धन्जा देवी की.जिनके बाएं पैर में हुए अप्रत्यासित फाइलेरिया ने उन्हें लाचारगी के उस हद पर पंहुचा दिया है जहाँ से वे अपने टूटते सपनो और तन्हाई के शिवा कुछ नहीं पाती है.उनके फाइलेरिया का आकार इतना बढ़ गया कि वे अपने दैनिक कार्य भी बड़ी मुश्किलों से कर पाती है.पिछले एक दशक में ही उनका जीवन सेवक से सेवा लायक हो गया.उनके मामले में राजनीति का कड़वा सच देखने को मिला.जिस बी.जे पी ने उन्हें टिकट देकर सभासद बनवाया था.उनके इलाज में कभी कोई सहयोग नहीं किया.अत्यंत गरीब विधवा महिला के पास इतना पैसा कभी नहीं रहा कि वे अच्छा इलाज करवा पाए.पचास से साठ हजार के खर्च के कारण उचित इलाज नहीं करवा पाने के कारण आज वे उस मलिन बस्ती के लिए बेकार हैं.जिसके लिए उन्होंने दिन रात एक किया हुआ था. बहरहाल उनकी बातों से आज भी मलिन बस्ती के लिए पीडा झलकती है.वे कहती हैं कि उन्हें पीडा है कि वे अब बस्ती के लिए काम नहीं आ पा रही है.पता नहीं भगवान ने मुझे ऐसा रोग क्यों दिया कि में अपना मनपसंद कार्य नहीं कर पाती. चलना मुझे सबसे अच्छा लगता था.
दर्द इतना की दर्द शब्द के मायने ही बदल जाये
उनके गले से टपकता पानी जैसे उन्हें भान करा रहा है की उनके जीवन का घडा जल्द ही सुख जायेगा.कुछ दिनों में वे इतिहास का हिस्सा हो जाएँगी,पीछे छोड़ जाएँगी एक लम्बी पारम्परिक उपेक्षा की दास्ताँ. ऐसी दास्ताँ जिसमे दर्द के अलावा कुछ भी नहीं.किसी माँ के लिए इससे बड़ा दर्द क्या होगा की उसके बच्चे उसे देखना पसंद न करें,एक काल कोठरी में बैठी वह अपने बच्चो की आवाज सुनने को बेचैन रहती है.लेकिन उनका समय अब तेजी से पूरा होते जा रहा है.उनके गले से तेजी से रिसाव हो रहा है,गावं वाले मान रहे है की वे अब कुछ दिनों की मेहमान हैं.हम बात कर रहे है सोनभद्र जिले के दुर्गम कहे जाने वाले नवा टोला की आदिवासी महिला दशोत्तरी देवी की.आठ वर्ष पहले उनके गले में हुए ट्यूमर ने अब अप्रत्यासित रूप धारण कर लिया है.जब वह छोटा था तभी उन्होंने इलाज शुरू किया था,लेकिन सरकारी चिकित्सको की निरंकुशता तथा जबरदस्त गरीबी ने उन्हें इलाज बंद करने पर मजबूर कर दिया.आज वे अपने रोग की वजह से पहचानी जाती हैं.भयंकर दर्द में जीने वाली इस आदिवासी महिला के पति राम अधार मायूस होते हुए कहते हैं की सैकडो चक्कर उन्होंने सामुदायिक स्वाश्थ्य केंद्र के लगाये लेकिन चिकित्सको के रवैये से यह लगता था की वे भी उसे देखना पसंद नहीं करते थे.एक बार चिकित्सको के पास ले जाने पर जो भी खर्च होता था उसके कारन दो दिनों तक घर में चूल्हा नहीं जल पता था.इस वजह से बच्चे भूखे रह जाते थे,जिसके वजह से इलाज बंद करना पड़ा.भावुक राम अधार कहते है की "उ दस्शो के नहीं बचा पईलें.कभो अतना पैसा नहीं रहल की ओके बनारस ले जा पायें.रोते हुए वे कहते है की " चला ठीक है इ जीना से मर जाना ठीक रही. खैर दशोत्तरी देवी तो अब कुछ दिनों की मेहमान है.लेकिन उनके प्रति बरती गई उपेक्षा ने यह साबित कर दिया है की आदिवासियों के मामले में यह देश कितना गंभीर है.
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