
सोनभद्र के पश्छिम में स्थित आदिवासी अंचल की एक कोठरी के किनारे पर बैठी युवती विवाह के दिन अपने किस्मत पर आंसू बहा रही है,वह अगले कुछ घंटो में आने वाले पल के बारे में सोच रही है.वहीं कोठरी के दुसरे किनारे पर बैठा युवती का पिता दूर से आ रही बारातियों के ढोल मजीरे की आवाज से भयभीत होते जा रहा है,बारात जितनी घर के पास आते जा रही थी उसकी धड़कने उतनी तेज होते जा रही थी.विवाह जैसे जीवन के सबसे बड़े उत्सव के दिन मुर्गिदांड टोले के रामदीन बैगा की धड़कने इतनी तेज हो गयी कि वे बेहोश हो गए.ढोल मजीरे सहित आदिवासियों के प्रमुख वाद्य यंत्रों की तेज आवाज ने जब उन्हें पुनः होश में लाया तो बारात उनके घर के सामने थी.होश में आते ही उन्होंने बारातियों के पैर पकड़ लिए,जब उन्होंने दुल्हे के पिता से बताया की घर में एक अन्न दाना नहीं है तो यह समझ में आ गया कि इस आदिवासी क्षेत्र को काला पानी क्यों कहते हैं.शायद ही ऐसा नजारा देखने को मिले की घर में बारात आई हो और घर में एक अन्न दाना नहीं.परन्तु देशभर में काला पानी के नाम से मशहूर इस आदिवासी इलाके के ज्यादातर हिस्से में यही नजारा है.इसी गावं का बब्बन बैगा चार दिन भूखे रहने के कारन दम तोड़ दिया.पूरे गावं में महुआ के अलावा एक दाना अनाज नहीं था की वे बब्बन को दे देते.स्तिथि यह की छोटा हो या बड़ा सभी के हिस्से में प्रतिदिन एक मुट्ठी महुआ ही आता है,वह भी दिन में एक बार.काला पानी कहे जाने वाले इन क्षेत्रो के आदिवासियों के साथ केवल सामाजिक संकट ही नहीं आया है बल्कि अब तो इनके अस्तित्व पर ही संकट के बदल मंडराने लगे है.पिछले पॉँच वर्षो से पड़ रहे जबरदस्त सूखे की वजह से ज्यादातर घरो में अनाज विलुप्तता के कगार पर है.सात वर्ष की लक्ष्मी ने जब बताया की चावल उसने कभी नहीं देखा तो कोई भी बता सकता है की यहाँ स्तिथि कितनी विकट है.लेकिन दर्द यही ख़त्म नहीं हुआ है इस आदिवासी अंचल को काला पानी क्यों कहते है इसकी बानगी तो देखिये.आजादी के ६० वर्षो बाद वर्तमान वैज्ञानिक युग में एक आदिवासी पानी के अभाव में मर गया .मरना तो समस्या का हल हो सकता है लेकिन रोज-रोज जीवन भर मरना,यह है काला पानी.बच्चे को धरती पर भगवान का स्वरुप माना गया है,लेकिन मजबूरी में उसी भगवान को आठ घंटे अकेले छोड़ना पड़े(यह नवजात शिशुओं की हालत है)तो समझिये हालत क्या है?बच्चो के साथ ऐसी स्तिथि सोच करके ही किसी के रोंगटे खड़े हो जायेंगे..उन माओं पर क्या बीतती होगी जिन्हें दो जून की रोटी के लिए अपने कलेजे के टुकरे को आठ घंटा अकेला छोड़ना पड़े.आज का भारत क्या यह सोच सकता है.दर्द यहाँ भी ख़त्म नहीं हो रहा है,अभी तो अस्तित्व के संकट का दर्द बाकी है.एक सर्वे के अनुसार ३० प्रतिशत महिलाओं का अनचाहा गर्भपात हो रहा है.माँ बनना संभवतः जीवन का सबसे संवेदनशील समय होता है.लेकिन गरीबी शब्द को और गरीब करती यहाँ की गरीबी में थाली में रोटी का ही संकट हो तो एक गर्भवती युवती की स्तिथि का अंदाजा लगाया जा सकता है.उस पर हाड़-तोड़ मेहनत.जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि पाने के लिए नारी यहाँ जूझती हालत में है.हम बात कर रहे है सोनभद्र जनपद के आदिवासी अंचल की.ओबरा पॉवर हाउस,हिंडाल्को,अनपरा पॉवर हाउस,रिहंद डैम,शक्तिनगर पॉवर हाउस,बीजपुर पॉवर हाउस,डाला सीमेंट फेक्ट्री सहित देश की कई सबसे बड़ी परियोजनाओं की वजह से शायद सोनभद्र की तस्वीर अलग छलावे भरे रूप को प्रदर्शित कराती हो लेकिन मूलतः आदिवासी बाहुल्य जनपद के आदिवासियों को देखकर लगता है की कालापानी शब्द की परिभाषा में वृद्दि होरही है.यह शायद शर्मनाक होगा कि इतनी तरक्की के बावजूद इस धरती का मूल नागरिक भूख और प्यास से मर रहा है.अन्य तरह की मौत हो सकता है कि केवल परिवार की क्षति हो लेकिन कृषि प्रधान देश में भूख से मौत उस देश की मौत के बराबर है.दुर्गमता और उपेक्षा के प्रतीक चोपन ब्लाक के ४० प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र ऐसे दुर्गम है जहाँ केवल सूरज की रौशनी ही पहुचती है.क्या आज तरक्की में बह रहे भरतीय ऐसी कल्पना करेंगे कि उनकी १०-११ साल की बच्ची ५ किमी तगडी धुप में पैदल चलकर पानी ला पायेगी,लेकिन इस कालापानी क्षेत्र पांडू चटटान की ११ वर्षीय गुड्डी जब घर पहुची तब उसका ५८ वर्षीय पिता बुझावन प्यास से मर चूका था.बाबु-बाबु कहती छोटी बच्ची काला पानी कि प्रतीक जैसी लग रही थी.छोटी सी उमर में पहाड़ चीरकर नाले से लाया पानी पल भर में गंगा जल बन गया.इस छोटी बच्ची का अब क्या होगा यह तो भगवान जाने,लेकिन पूरे प्रदेश के कर्मचारियों की तनख्वाह देने वाले आदिवासी बाहुल्य जनपद में अगर एक आदिवासी प्यास से मर जाये तो यह निहायत शर्मनाक है.

बन्धु आपके ब्लॉग में सोनभद्र की जो भयानक तस्वीर पेश की है जिसको पड़कर रोगटे खड़े हो जाते है ,अगर ये सत्य है तो हम जो आज कहते है की हम दुनिया की मजबूत दूसरी अर्थ व्यवस्था है और हम चाँद पर पहुच गए है उसके बाद आज उसी देश में लोग भूख और प्यास से बेहाल है और आत्महत्या कर रहे है तो इससे शर्मनाक क्या हो सकता है ,ये बात आज हमारे देश के कर्ण धारो को सोचना पड़ेगा ,आप का ब्लॉग काफी अच्छा है.,
जवाब देंहटाएंब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है. कभी इस डाकिया से भी मुलाकात करें .
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंhello bro ......
जवाब देंहटाएंi never thought that .....such bad condition are present in India at dis time ...i had never imagine this, it is all due to political misbehavior.
thank you bro